'अपने रहने को झोपड़ी नहीं,
उनके मरने पे ताजमहल बनता है।'
ये पंक्तियाँ मुझे तब चरितार्थ होतीं लगतीं हैं जब मैं इजिपुरा में बसे झोपड़पट्टी को वीभत्स रूप में देखती हूँ। लगभग एक सप्ताह पहले BBMP वालों ने यहाँ पर बसे लोगों को बेघर कर दिया, बेघर हुए लोगों का कहना है कि उन्हें मॉल वालों ने खाली करवाया है।
अगर इस बात में थोड़ी भी सत्यता है तो कितनी अजीब बात है। भारत में लगभग 93 मिलियन लोग स्लम में रहते हैं, उनका ही एक हिस्सा इजिपुरा है।
लोगों को बेघर कर मॉल या रेस्टोरेंट बनाने से क्या उनके सर पे छत हो सकती है, उनकी भूख मिट सकती है!
आज हमारा देश शहरीकरण , आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर है, पूर्णतः औद्योगिकीकरण की ओर उन्मुख हो चला है; तरक्की भी कर रहा है,...खेत खलिहान की जगह फैक्ट्री, मॉल।
पण्डित नेहरु का स्वप्न सोशलिस्ट स्टेट का और हमारे बापू का लघु उद्योग सही में सपना ही था। लहलहाते खेत, उनकी संकड़ी रास्तों पे बच्चों का दौड़ना ... आजादी के 65 साल बाद भी ये आसानी से मयस्सर नहीं है। हँसती-खेलतीं बस्तियाँ मिनटों में वीरान कर दीं जाती हैं अब भी ...
सरकार के प्रति लोगों का आक्रोश बिलकुल जायज है। पर क्या उनकी गाथा सरकार तक पहुँचती भी है। मीडिया हर ऱोज उनका हाल कैमरा में कैद तो कर लेती है, लेकिन क्या कोई ठोस परिणाम निकल पाता है?
'राईट टू होम हमारे राईट टू लाइफ' में आता है पर क्या सच में उसका लुत्फ़ उठा पाते हैं! इतने सारे प्रश्न, इनके जवाब कौन देगा, भ्रष्ट सरकार, उनके चमचे, ब्यूरोक्रेट या फिर दम तोड़ता प्रजातन्त्र। ये विडम्बना ही तो है भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र एक किम्वदन्ति बन कर रह गया है।
उनके मरने पे ताजमहल बनता है।'
ये पंक्तियाँ मुझे तब चरितार्थ होतीं लगतीं हैं जब मैं इजिपुरा में बसे झोपड़पट्टी को वीभत्स रूप में देखती हूँ। लगभग एक सप्ताह पहले BBMP वालों ने यहाँ पर बसे लोगों को बेघर कर दिया, बेघर हुए लोगों का कहना है कि उन्हें मॉल वालों ने खाली करवाया है।
अगर इस बात में थोड़ी भी सत्यता है तो कितनी अजीब बात है। भारत में लगभग 93 मिलियन लोग स्लम में रहते हैं, उनका ही एक हिस्सा इजिपुरा है।
लोगों को बेघर कर मॉल या रेस्टोरेंट बनाने से क्या उनके सर पे छत हो सकती है, उनकी भूख मिट सकती है!
आज हमारा देश शहरीकरण , आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर है, पूर्णतः औद्योगिकीकरण की ओर उन्मुख हो चला है; तरक्की भी कर रहा है,...खेत खलिहान की जगह फैक्ट्री, मॉल।
पण्डित नेहरु का स्वप्न सोशलिस्ट स्टेट का और हमारे बापू का लघु उद्योग सही में सपना ही था। लहलहाते खेत, उनकी संकड़ी रास्तों पे बच्चों का दौड़ना ... आजादी के 65 साल बाद भी ये आसानी से मयस्सर नहीं है। हँसती-खेलतीं बस्तियाँ मिनटों में वीरान कर दीं जाती हैं अब भी ...
सरकार के प्रति लोगों का आक्रोश बिलकुल जायज है। पर क्या उनकी गाथा सरकार तक पहुँचती भी है। मीडिया हर ऱोज उनका हाल कैमरा में कैद तो कर लेती है, लेकिन क्या कोई ठोस परिणाम निकल पाता है?
'राईट टू होम हमारे राईट टू लाइफ' में आता है पर क्या सच में उसका लुत्फ़ उठा पाते हैं! इतने सारे प्रश्न, इनके जवाब कौन देगा, भ्रष्ट सरकार, उनके चमचे, ब्यूरोक्रेट या फिर दम तोड़ता प्रजातन्त्र। ये विडम्बना ही तो है भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र एक किम्वदन्ति बन कर रह गया है।

