Saturday, 26 January 2013

विकास लेकिन कीमत क्या ?

'अपने रहने को झोपड़ी नहीं,
उनके मरने पे ताजमहल बनता है।'

ये पंक्तियाँ मुझे तब चरितार्थ होतीं लगतीं हैं जब मैं इजिपुरा में बसे झोपड़पट्टी को वीभत्स रूप में देखती हूँ। लगभग एक सप्ताह पहले BBMP वालों ने यहाँ पर बसे लोगों को बेघर कर दिया, बेघर हुए लोगों का कहना है कि उन्हें मॉल वालों ने खाली करवाया है।
अगर इस बात में थोड़ी भी सत्यता है तो कितनी अजीब बात है। भारत में लगभग 93 मिलियन लोग स्लम में रहते हैं, उनका ही एक हिस्सा इजिपुरा है।
लोगों को बेघर कर मॉल या रेस्टोरेंट बनाने से क्या उनके सर पे छत हो सकती है, उनकी भूख मिट सकती है!

आज हमारा देश शहरीकरण , आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर है, पूर्णतः औद्योगिकीकरण की ओर उन्मुख हो चला है; तरक्की भी कर रहा है,...खेत खलिहान की जगह फैक्ट्री, मॉल।
पण्डित नेहरु का स्वप्न सोशलिस्ट स्टेट का और हमारे बापू का लघु उद्योग सही में सपना ही था। लहलहाते खेत, उनकी संकड़ी रास्तों पे बच्चों का दौड़ना ... आजादी के 65 साल बाद भी ये आसानी से मयस्सर नहीं है। हँसती-खेलतीं बस्तियाँ मिनटों में वीरान कर दीं जाती हैं अब भी ...

सरकार  के प्रति लोगों का आक्रोश बिलकुल जायज है। पर क्या उनकी गाथा सरकार तक पहुँचती भी है। मीडिया हर ऱोज उनका हाल कैमरा में कैद तो कर लेती है, लेकिन क्या कोई ठोस परिणाम निकल पाता है?
'राईट टू होम हमारे राईट टू लाइफ' में आता है पर क्या सच में उसका लुत्फ़ उठा पाते  हैं! इतने सारे प्रश्न, इनके जवाब कौन देगा, भ्रष्ट सरकार, उनके चमचे, ब्यूरोक्रेट या फिर दम तोड़ता प्रजातन्त्र। ये विडम्बना ही तो है भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातन्त्र एक किम्वदन्ति बन कर रह गया है।

Monday, 21 January 2013

अमानवीय मानव

क्या हम सुरक्षित हैं ....
ये एक ऐसा प्रश्न है जो हर तबके के लोगों के मन में कोलाहल मचा जाता है। आतंकवाद हो; क्षेत्रवाद हो या फिर 16 दिसम्बर को घटी अमानवीय घटना। क्या हम इस कदर गिर चुके हैं या हमारा मानव इस कदर ख़त्म हो चुका  है कि उस लड़की की दिल दहलानेवाली चीख ने भी दोषी के मन को नहीं झकझोरा होगा!

मर्यादा पुरूषोत्तम राम की धरती ने शायद अपने पुरुषार्थ को खो दिया है। मानवता का इस कदर पतन, क्या गाँधी का यही परिकल्पित रामराज्य है!

'यत्र नारी पूज्यते रमन्ते तत्र देवता'
ये श्लोक हम छठी-सातवीं कक्षा में पढ़ते हैं, भावार्थ सहित कंठस्थ भी कर जाते हैं पर क्या वास्तविक जीवन में अपना पाते हैं। इसका मापदण्ड तो 16 दिसम्बर की घटना से ही ज्ञात होता है। शब्दों को सीखने की नहीं उनको अपनाने की जरुरत है। वक़्त है कि हम अपने रोजमर्रा की ज़िन्दगी से बाहर झाँकें और कुछ वक़्त अपने अन्दर गुम होते हुए मानव के लिए निकालें।

ये हमारे देश की पहली घटना नहीं, न जाने ऐसे सैकड़ो घटनाएँ लगभग हर एक थाने की पुलिस फ़ाइल में दबीं पड़ी होगी और हर घटना के बाद हम जागते हैं मौन,शोक, कैंडल मार्च, धरना, रैली पे उतर जाते हैं... इसमें कोई दोमत नहीं कि इनसे सरकार का तख्ता थोड़ा हिल तो जाता है पर क्या हमें कोई ठोस समाधान मिल पाता है!
दुष्यंत कुमार के ये शब्द आज भी कितने सार्थक जान पड़ते हैं:
"आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। "